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Thursday 28 August, 2008
 19:27 | 27/Dec/2007 |  1 Comment(s)
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vo roj bulane aati hai...

अंबर की डोली से निकल कर वो रोज बुलाने आती है, नींद के मखमली आँचल मे वो रोज झुलाने आती है, इक मीठी सी लोरी गाती है,
प्यार से थप थपाति है,
फिर होल से तुम को सुलाती है,
चाँद सितारो की दुनिया में वो सपनो संग घुमाती है,
अंतरिक्ष मे काजल की नदिया में डुबकी लगती है,
गम की काली चादर को खुशियो से धुलाने लाती है,
वो रोज बुलाने आती है..................
सूरज को शीतल करती वो चंदा से टपकते अमृत से,
शर्करा से मीठे शरबत से,
पंख लगा कर उड़ाती है,
बादलों की सैएर करवाती है,
पानी पे दौड़ लगवाती है,
सपनो की सर्कस के अजब से खेल दिखलती है,
कल्पनाओ की सरगम से मधुर संगीत बजाती है,
वो धुनो को खूब नाचती है,
मुरझाए फूलों के चेहरों पे औस की बूँदें छल्काति है,
सपनो मे देखे सपनो केलिए वो नया सवेरा लाती है,
वो रोज बुलाने आती है....................
"कृष्ण शर्मा"

Category: Poetry | Permalink