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unko kuch samajh nhi aayega...
इश्क़ की तकदीर-ए-तस्वीर मे रंगों का जुनून नही आयेगा, आड़ि तिरछी लकीरों का ही बस इक हुजूम नज़र आयेगा, गर वो चुप रह कर रुसवाईयों मे ही खत पढ़ते रहे, तो कयामत तक भी समझ उनको मजमून नही आयेगा, बेरुखी के काँटों से हर पोर छिल उठेगा, माथे पे उमड़ती बूंदों मे भी सुर्ख खून उतर आयेगा, फिर ना कभी कोई शेर-और-गजल़ महकेगी बहारों की, महफिलों मे नही फिर तनहआईओं मे ही सुकून आयेगा...
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