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krishan sharma
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Thursday 28 August, 2008
 19:05 | 14/Feb/2008 |  1 Comment(s)
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ye tamannayen

अंबर की गोद मे चहकते ये बादल,
मानो नीली चादर पे कुछ मोती टहल रहें हैं,
इस जहाँ को बाहों मे ले कर कुछ कह रहे हैं,
आओ कुछ पल मेरे संग तुम झूम लो,
सूरज की किरणो के रंगों को चूम लो,
तिनका तिनका उड़ा दो हवाओं के जैसे,
खुल के गर्जो मुस्कुराओ घटाओं के जैसे,
आ जाओ बढ़ा के तुम बाहों को अपनी,
खुद चुन लो चमकती राहों को अपनी,
क्या ये पर्वत ये झरने ये नदियों के चेहरे,
आकर देखो उड़ते टीले सुनहरे,
कभी खुशबू उड़ पड़ती बहारों के चमन से,
कुछ तितलियाँ छू जातीं घूमती पवन से,
इस कुदरत की साँसों मे जैसे हम ही रहते हैं,
प्यासी तरसती निगाहों मे हम ही बस्तें हैं,
काले सफेद कभी बन जाते चितकबरे,
हर खुशी को अपनी चुख्ट पे पाते बिखरते,
आजाओ तुम भी खेलो कुछ देर मेरे आँचल मे,
सांप - सीडी कभी लूडो के पासों से,
ना दबाओ जो कहतीं हैं ये धड़कन,
ये बेचैन अपने वजूद को पाने की तड़पन,
कहीं यूँ ही ना खो जाएँ ना मर जाएँ,
मन की कश्ती पे खेलती ये तमन्नायें,

Category: Poetry | Permalink